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"कोरोंना भी परेशान है"


संकट के दौर में एक जिम्मेदार शहरी कि प्रतिक्रया व उसमे निहित मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति , सामाजिक औ‌र मानवीय जिम्मेदारियों को‌ निभाने कि ललक ही उस शहर को सभ्य, उन्नत व समर्थ बनाती हैं। किसी भी राष्ट्र का "मानव विकास सूचकांक" कि टेबल में उसकी उपस्थित क्रम ही उस राष्ट्र के नागरिकों की मानसिक, शैक्षणिक, आर्थिक व नागरिक दायित्वों के निर्वहन में उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। जब राज्य समर्थ शहरियों द्वारा संचालित होता है तभी वह प्राकृतिक, सामाजिक व संवैधानिक न्याय प्रदान कर पाता है। राज्य की क्षमताओं की अग्नि परीक्षा विपत्ति काल में सरकार द्वारा जन- धन की समस्याओं के समाधान में परिलक्षित होता है। निश्चिंत मत बैठिए, देश कोरोना महामरी से ग्रसित है। सरकार अग्नि परीक्षा से गुजर रही है और अब राष्ट्र का इम्तिहान है।

और दुनिया के स्वयंभू जो " प्रकृति" को धता बता कर, खुद को खुदा बना बैठे थे, महामारी के इस दौर में कितने लाचार हैं । हमे क्या करना खुदा की खुदाई से जब "खुदा" खुद से परेशान है। कोरोना के भौकाल से अब लगता है कि आपुन भी "इंसान" है, नहीं तो लगता था, कि आपुन ही "भगवान" है।

हा हा हा .....! जीवन भर कानून की पैरवी करते - करते, न जाने कब खुद के जीने कि पैरवी सुरु कर दी। बमुश्किल चंद मुवक्किल बनाए थे , न जाने कब खुद गुनहगार बन गए। अभी तो चंद लम्हे बमुश्किल गुजरे हैं, न जाने कब मझधार में हम सब कुछ छोड़ जाएं। कोरोना का भौकाल यूं पसरा है कि इंसानियत भी शर्मसार है । क्या करें घर में रोजाना अब, यह तो धैर्य की इंतिहा है।

मनुष्य पाषाण काल में जानवरों का सहचर था और टाइगर जंगल का राजा। टाइगर का शासन स्थापित था जो कि उसे निरंकुश और बेखौफ बनाता था। जब दिल करता वन्य प्राणी का शिकार करता और जब भी खतरा देखता तो बेखौफ आक्रमण करता, परन्तु मनुष्य उसी जंगल में बाकी निरीह वन्य प्राणियों को अपना दोस्त बनता और खुद को कॉमन इंटरेस्ट के साथ सरवाइव करता। मै जो कुछ भी कह रहा हूं वह आप सभी ने "जंगल बुक" में मोगली और शेरखान को देखा होगा। मुकदमा अभी खतम नहीं हुआ क्यों कि पाषाण काल से आधुनिक काल का सफर बहुत साहसिक और लम्बा है।

मनुष्य दुनिया का सबसे डरपोक प्राणी है और टाइगर सबसे निडर । मनुष्य खतरे को भांपते ही खुद को संभालता है, बचाता है, यहां तक कि सुरक्षित जगह में छिप जाता है। वहीं से खतरे का आंकलन करता है और उस खतरे से निबटने के उपाय ढूंढता है और पूरे तैयारी के साथ खतरे या दुश्मन पर धावा बोल कर वह विजय प्राप्त करता है। मनुष्य का यही गुण उसे टाइगर से भिन्न बनाता है। मनुष्य के सहअस्तित्व के गुण ने परिवार व समाज बनाया और बात यहां पर ही नहीं रुकी उसने खुद ही वन, जीव, प्रकृति, पर्यावरण, पृथ्वी, ग्रह,नक्षत्र, आकाश, पाताल सभी की जिम्मेवारी का भी बोझ उठा लिया। वहीं पर टाइगर जो कि जंगल का राजा होता था अपने निडर स्वभाव के कारण आज वह खुद शिकार हो गया है और उसके बचाने के लिए टाइगर रिजर्व प्रोजेक्ट पूरे विश्व में चलाए जा रहें है।

परन्तु मनुष्य दुनिया का सबसे होशियार प्राणी होने के बाद भी वह सबसे मूर्ख प्राणी साबित होता है जब उसे होशियारी पे कुछ ज्यादा गुमान हों जाता है। घटना 2 फरवरी, 2020 की है जब चाइनीज इटालियन मूल का 29 वर्ष का युवा "मासिमिलियानो मार्टिगली जियांग" जो कि इटली के फ़लोरेंस सिटी के ऐतिहासिक केंद्र की सड़कों पर घंटों तक खड़ा रहा अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर और चेहरे का मुखौटा पहने हुए तथा एक सांकेतिक बोर्ड लिए कह रहा था कि "मैं वायरस नहीं हूं, मैं एक इंसान हूं:" पूर्वाग्रह मिटाओ ”।"वायरस से दूर चलो, लोगों से नहीं। पूर्वाग्रह अज्ञानता से पैदा हुआ है।" उसके बाद सोशल मीडिया में नस्लवाद के विरूद्ध मुहिम चली और फ्लोरेंस के मेयर ने चीनी मूल के लोगों को गले लगाए और बाकी लोगों ने भी गले लगी तस्वीरे सोशल मीडिया में साझा करनी सुरु कर दी।

मूर्खता की हद तब हो गई जब अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने "नमस्ते ट्रंप" कार्यक्रम के आयोजन में जोर शोर से भाग लिया और अमेरिकी राष्ट्रपति 24 फरवरी, 2020 को दो दिवसीय दौरे पर भारत आए। गुजराती समाज और मोदी सरकार ने अपने धनवैभव, व्यवसायिक व प्रशासनिक शक्ति की भरपूर नुमाइश की। पूरा अहमदाबाद और स्टेडियम लोगों और बैनरों से पट गया। पूरे देश में विश्व भर से 5 लाख या उससे ज्यादा लोगों का मूवमेंट रहा और लाखों लोगों ने ट्रंप के स्वागत में शिरकत किया।

हम लोग भी कोई दूध से धुले हुए नहीं थे। वह लम्हा अभी भी जहन में ताजा है जब मै कुछ दोस्तों के साथ सुप्रीम कोर्ट की कैफिटेरिया में चाय की चुस्की के बीच बिना किसी डर के लुफ़्त उठा रहा था और मेरे दोस्तों ने चीन में फैली अनजान छुआछूत की महामरी से हो रही मौतों का जस्न मना रहे थे और चीनियों द्वारा चमगादड़ का सूप पीने की खिल्ली उड़ा रहे थे। तब क्या पता था कि कोरोना महामारी हामारे मुल्क में मौत का तांडव मचाएगीऔर देश भुखमरी के कगार में खड़ा होगा।

W.H.O. ने COVID 19 को 13 मार्च को महामारी घोषित किया की लॉकडाउन की बहार यूरोप, अमेरिका से होते हुए हमारे देश तक आ पहुंची। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से सारा देश सरप्राइज के दौर से गुजर रहा हैं। 22 मार्च को मोदी ने कुछ जुदा अंदाज में जनता कार्फू लगवा दिया। संडे का दिन था रेखा खुश थी क्यों की शाम को जों थाली और ताली बजानी थी। मॉर्निंग से मै भी कुछ कम खुश न था आज मुझे पूर्ण स्वतंत्रता थी घर में, क्यों की जानता कार्फू जो था और शाम को मुझे रेखा के साथ सन्डे मार्केटिंग कि बोरियत से मुक्ति जो मिली थी। पहली बार मेरी सोसायटी और न्यूज चैनलों द्वारा पता चला कि लोगों ने थाली बजाई और ताली बजाई। एक नया जोश कोरोना वारियर को सपोर्ट करने का और यह सब मोदी के आहवान पर हुआ था। मोदी, सरकार के निर्णयों को सरप्राइज के तौर पर जनता को अवगत कराते है तथा निर्णयों को फ्रंट से लीड करने का अदम्य साहस रखते हैं। 24 फरवरी का नेशनल टीवी चैनल में संबोधन के दौरान मानवीय मूल्यों को बल देते हुए कहा कि "जान है तो जहान है"और इसके बाद 24-25 फरवरी की मध्य रात्रि से देश में 21 दिन का संपूर्ण लॉकडाउन की घोषणा हो गई। मैंने मोदी को प्रधानमंत्री से स्टेट्समैन बनते देख रहा था। और हम सब लॉकडाउन 1.0 काल में पहुंच गए। उस समय देश में कोरोना पेशेंट की अनुमानित संख्या 500 के करीब थी और लोगों को उनके घर में या जो जंहा तहां थे वान्हा रोक दिया गया। बस, ट्रेन, प्लेन सब कुछ बंद और देश में कार्फू लग गया। रोडें बरिकैट कर दी गईं और शहरों में रात - दिन सन्नाटा छा गया।

लॉकडाउन 1.0 का समय मेरे जीवन का स्वर्ण काल था। मुझे पहली बार जीवन में महसूस हुआ की हम जमीदारों के खानदान से हैं। रात रात वेब सीरीज देखने की दीवानगी और इश्क का खुमान छाया था क्यों कि ड्राइंग रूम में टीवी के सामने अपना जो आसन जमा लिया था गेस्ट रूम के वेड मैटर्स को जमीन में बिछा कर, मसनद और पिलो के साथ बैठ पूरे चौड़ के साथ ड्रिंक्स ऑन रॉक में डूबा ही था कि एनडीटीवी न्यूज ने मुंबई, दिल्ली जैसे महानगरों से पैदल जाते प्रवासी मजदूरों के काफिले की रिपोर्टिंग सुरु कर दी। देश के अंदर बद इंताजमी और अनपलांड लॉक डॉउन की तस्वीर सामने लाकर टीआरपी बड़ाई ही थी कि अन्य न्यूज चैनल भी कूद पड़े देश की लज्जा को तार - तार करने, बची कुची कसर केजरीवाल और योगी ने पूरी कर दी मीडिया और ट्विटर अकाउंट से अनाउंस कर के जो भी प्रवासी मजदूर अपने घर जाना चाहते हैं हम उन्हें बस मुहैया कराएंगे । बस क्या 28 मार्च को आनंद विहार बस अड्डे में डेढ़ से दो लाख लोग इकट्ठा हो गए, भीड़ और भसड़ मच गई। बसों में लोग ऊपर नीचे लद रहे थे और बांकी लोग बसों को इधर उधर ढूंढ रहे थे या इंतजार कर रहे थे। न्यूज चैनल बिना किसी परवाह के लाइव टेलीकास्ट कर रहें थे और देश पूरे दुनिया में नग्गा हो रहा था।

इस देश में सबसे ज्यादा ज्ञान व्हाटसएप यूनिवर्सिटी द्वारा प्राप्त होता है खास तौर से मुझे। मै भी व्हाट्सएप ग्रुप में खूब भाग लेता हूं और व्हाट्सएप न्यूज, व्हाट्सएप ज्ञान को तेजी से शेयर करता हूं, राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक विचारधारा पर बहस शुरू कर देता हूं जिससे टकरार पैदा होने लगती है क्यों कि लोगों के विचारों पर जो मंथन करने लगा, जिससे आरोप प्रत्यारोप का दौर चालू हो गया और यह सब मै अकेले नहीं, शायद जनाब आप भी कर रहें हैं। बघेली में एक कहावत है कि " बैठी बानिन का करय, या कुठिला के धान वा कुठिला मा धरय" और यह सब हम सब फुर्सत के कारण कर रहे थे, पर अब शायद नहीं कर पाएंगे।

न्यूज आयी की 28-29 मार्च को तब्लीगी जमात के निजामुद्दीन, दिल्ली में स्थित मरकज में धार्मिक आयोजन में भाग लेने के लिए दो डाई हजार लोग देश विदेश से इकठ्ठा हुए हैं और वांहा पर कोरॉना फैल गया है। यह घटना टीवी न्यूज से निकल कर वॉट्सऐप ग्रुप, फेसबुक, ट्विटर में दौड़ने लगी। धार्मिक आरोप और प्रत्यारोप का दौर चालू हो गया। पुलिस बल और केंद्र की तरफ से हमारे जेम्स बॉन्ड अजीत डोभाल ने पहल की और मरकज को खाली कराया गया और लोगों को क्वारीनटीन किया गया। प्रायोजित तरह से देश में हंगामा और नफरत का दौर चला जिसकी अगुवाई अंजना ओम कश्यप, अर्णव गोस्वामी, सुधीर चौधरी जैसे धुरंधरों ने न्यूज चैनलों में डिबेट आयोजित कर के की और रही सही कसर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी, फेसबुक, ट्विटर ने पूरी की। 31 मार्च को तब्लीगी जमात के धार्मिक गुरु मुहम्मद साद खंद्वाली के विरूद्ध एफआईआर हुई और वो अभी तक फरार है। मै भी अपने मित्र नागेन्द्र दुबे के निजी वॅटासप चैट में मुस्लिम समुदाय और तब्लीगी जमात के विषय में बस अपनी राय रखी ही थी कि उसने मेरा हवाला देते हुए फेसबुक में शेयर कर दी, फिर क्या मै गद्दार घोषित हो गया। परन्तु 30 मार्च को ही गुरुद्वारा "मजनू का टीला", दिल्ली में 300 से ज्यादा कोरॉना पॉजिटिव पाए गए और उसकी भी एफआईआर दर्ज हुई परन्तु सारी न्यूज दबा दी गई जिसका मतलब आप समझते है, मुझे इतनी ज्यादा समझ कंहा ।

मोदी ने देशवासियों से मदद की दरख्वास्त की और टाटा ट्रस्ट, रतन टाटा, अजीज प्रेम जी, अक्षय कुमार, रिलायंस फाउंडेशन जैसे अनगिनत दानदाता सामने आ गए और प्रधानमंत्री राहत कोष में करोड़ों करोड़ रुपए जमा हो गए। अक्षय कुमार को मीडिया ने ब्रांड एंबेसडर के तौर पर प्रस्तुत किया ताकि ज्यादा से ज्यादा मदद सामने आ सके। इसी दौर पर व्हाट्सएप और फेसबुक में तेजी से टाटा का और रतन टाटा का गुणगान बड़ा तथा देसी और विदेशी कंपनियों का अंतर साफ झलक ने लगा। मुझे भी टाटा के ऊपर फक्र महसूस होता है और टाटा जैसे इंडस्ट्रीलिस्ट देश की पहचान हैं।

लॉकडाउन के दौरान जोर जबरदस्ती और बल प्रयोग पुलिस और जनता के बीच बहुत ज्यादा बढ़ गया था ।‌ 8 अप्रैल को पटियाला, पंजाब के सरोना मंडी में अनधिकृत तौर से निहंग समाज के सिखों को मंडी में प्रवेश रोकने पर मुठभेड़ हुई, जिससे एक निहंग ने तलवार से पुलिस वाले का हाथ काटकर अलग कर दिया। सिखों की बहादुरी की मिसाल देश ने सुनी बहुत थी परंतु लाइव टेलीकास्ट में सब ने देखा कि किस तरह से वह बहादुर सिख पुलिसवाला अपने हाथ को दूसरे हाथ से उठाकर खुद स्कूटर पर बैठ कर हॉस्पिटल की तरफ भागा और ईश्वर ने मदद की, डॉक्टरों ने उसके हाथ को जोड़ दिया।

देशवासी जो भी करें, परन्तु मोदी वहीं करते हैं जो कि उचित है। 14 अप्रैल को फिर हम सब मुखाबिर हुए मोदी जी से और उन्होंने ने देश के गारजियन की तरह हम सब से संवाद कायम किया और लॉक डॉउन 2.0 की घोषणा कर दी जिसे 17 दिनों यानी 3 मई तक बड़ा दिया गया। और यहीं से मेरे जीवन का सबसे बुरा और अवसाद का दौर चालू हुआ। लगातार टीवी चैनल्स न्यूज के द्वारा स्वास्थ्य व्यवस्था के बद इंताजमी, भूखमरी, राज्य सरकारों का फैलियर दिखाने लगा। कोरना महामारी के दौर में मेडिकल की लचर व्यवस्था और जरूरी स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, पैसे का आभाव, मेडिकल इक्विपमेंट कि सप्लाई की समस्या, देश में जरूरी मेडिकल जरूरतों का उत्पादन ना होना आदि सब उजागर होने लगा। कोरॉना टेस्टिंग लेब का अभाव और मेडिकल इंडस्ट्री द्वारा खुलेआम लूट सब सामान्य बाते हो चली थी। मुंबई, अहमदाबाद, दिल्ली, इंदौर जैसे बड़े शहर कोरॉना महामारी से ग्रसित हो गए और देश के लगभग सारे बड़े शहर कोरॉना की चपेट में आने लगे और कोरॉना पेसेंटों और मृतकों की संख्या बेतहाशा बड़ने लगी।

महामारी और संकट में राजनीत, भ्रष्टाचार और आरोप प्रत्यारोप की पाठशाला सिर्फ भारत जैसे मुल्कों में चलती है और यूरोप, अमेरिका जैसे मुल्कों के नेताओं और नागरिकों को हमसे ट्विशन लेनी चाहिए। राज्य सरकारें, बीजेपी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी में बट गई। कोरॉना महामारी की जगह राजनीत का केंद्र बन गयी। केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारें तक अपनी रोटी सेंकने लगी। पता नहीं क्यों हम सब चुप बैठे हैं और अपनी नागरिक क्षमताओं का उपयोग विपत्ति काल पर नहीं किया। कलेक्टर से लेकर कोटेदार तक, स्वास्थ्य सचिव से लेकर सीएमओ तक सभी भ्रष्टाचार की वैतरणी में गोते लगा रहे है और लाखों कमाई पर लगे हुए। पूरा समाज, प्रवासी मजदूर, फैक्ट्री में काम करने वाले डेली वेजेस लेबर और हम जैसे लोग बेरोजगार व भुखमरी के कगार पर खड़े हो गए थे।

लॉकडाउन में फंसे हुए कामगारों ने घर जाने की जिद मे, सूरत में धरना प्रदर्शन 10 अप्रैल से चालू कर रखा था और इस दौर पर आगजनी और दुकानों के तोड़फोड़ तक पहुंच गए। 15 अप्रैल को बांद्रा रेलवे स्टेशन में अफवाह फैली बिहार और यूपी के लिए ट्रेन जा रही है जिससे घंटों में 15,000 से ज्यादा लोग इकट्ठा हो गए और पुलिस मुख दर्शक बनी रहे। सोशल डिस्टेंसिंग को जनता जनार्दन ने एक जुमला बना रखा था। मुंबई और दिल्ली में फंसे प्रवासी मजदूर व घर से महानगर में आए युवा भूख की कगार पर थे राहत शिविर सिर्फ न्यूज़ चैनल और मीडिया तक सीमित, जमीन पर दूर-दूर तक किसी भी तरह के कोई भी मदद आम जनता तक नहीं पहुंच रही थी। खाद्य पदार्थों के दाम इस दौरान पर आसमान छू रहे थे और राज्य सरकारें विवश मूक दर्शक बनी हुई थी। परंतु सोनू सूद जैसे लोगऔर गुरुद्वारे, सामाजिक समितियां अपने सेवाएं जारी कर रखे थी। एक लोगों को मुंबई से घर जाने पर मदद कर रहा था तो दूसरा भूखों को रात दिन भोजन दे रहा था।

ईश्वर से मेरी खुशी देखी नहीं गई, इरफ़ान खान जो कि पहले से ही कैंसर से जूझ रहे थे फिल्म की साउंड डबिंग के दौरान करोना इनफेक्टेड हुए और सांस लेने की शिकायत हुई जिससे कोकिलाबेन हॉस्पिटल में 29 अप्रैल को उनका निधन हो गया। इरफान कि स्वाभाविक एक्टिंग की क्षमताओं का कायल था और उनकी मृत्यु ने मुझे अवसाद की ओर धकेल दिया। अगले ही दिन 30 अप्रैल को फिल्म इंडस्ट्री के रोमांटिक हीरो ऋषि कपूर जो मुझे पहली बार "मुल्क" में कलाकार के तौर पर दिखे वो चल बसे।

महामारी रुकती कहां है और लोग भी नही रुकते। लॉकडाउन 2.0 के बाद से ही राज्य सरकारें पैसों की कमी का रोना रोने लगी और केंद्र सरकार से मदद की गुहार लगाने लगी। राज्य सरकार किसी भी तरह की जनता को मेडिकल सपोर्ट, जनता को राशन की व्यवस्था और कर्मचारियों को वेतन मुहैया कराने से असमर्थता प्रकट कर दी। देश के सबसे होनहार और अनुभवी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने लिकर शॉप को खोलने का दबाव बनाना शुरू कर दिया जिससे मोदी ने राज्यों के दबाव में आकर लॉकडाउन फेस 3.0 में कुछ रियायत की घोषणा कर दी जिसमें शराब की दुकान 4 मई से दिल्ली, पंजाब जैसे प्रदेशों में खुल गई।

लॉक डॉउन 3.0 लागू होने की पहली सुबह जब टेलीविजन चालू किया तो न्यूज चैनल में कैमरामैन शराब की दुकान में किलोमीटरों लंबी लोगों की लाइन दिखा रहा था तो दूसरी तरफ खरीदारों कि वाइन शॉप के सामने शराब खरीदने कि होड़ में संघर्ष करती भीड़ और उस भीड़ में लट्ठ भांजती पुलिस, डंडे के डर से तितर बितर होते लोग और उस भीड़ को कवर करती न्यूज चैनलों के संवाददाता की रिपोर्टिंग के बीच देश का मंजर ऐसा दिखा की सोशल डिस्टेंसिंग, लाकडाउन और कोरोना वायरस तो बस मोदीजी के जुमले है और यह जुमलों की सरकार है। न्यूज़ चैनल खोलने के साथ जीने की ललक फिर से लगी, क्यों कि मयखाने फिर से गुलजार थे।

लॉक डॉउन 3.0 ने फिर से हिंदुस्तान का विभाजन रेड जोन, ऑरेंज जोन और ग्रीन जोन के आधार पर कर दिया। परन्तु यह विभाजन कोरोना ने किया था, ना कि मुस्लिमों ने, जो धर्म को आधार बनाकर हिंदुस्तान का विभाजन 15 अगस्त 1947 में कराया था यद्यपि ग्रीन जोन में रहने वाले हिन्दुस्तानियों की खुशियों का कोई ठिकाना नहीं और वह उतना ही फक्र महसूस कर रहें है जैसे देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान में रहने वाले मुसलमान। महानगरों से गांव लौटते प्रवासी मजदूरों को देख कर, ग्रीन जोन में बसर करने वाले भारतीय उन्हें मुहाजिर के नजरिए से देखते है (जैसा कि पाकिस्तान में विभाजन के बाद, हिंदुस्तान के अन्य हिस्सों से पहुंचे मुसलमान)। पता नहीं क्यों मुझे भारत के लोकतंत्र और लोगों की चुनीं हुई सरकार पर से भरोसा उठ रहा था।

कोरोना और भुखमरी के कारण प्रवासी मजदूर पैदल ट्रेन की पटरी पटरी अपने गांव जा रहे थे की थकावट के कारण औरंगाबाद के पास पटरी में ही सो गए, उन्हें क्या पता था की 5 मई की मनहूस रात मौत बनकर मालगाड़ी में आएगी और उन्हें जिंदा काट देगी। पटरी पर दूर-दूर तक फैले रोटियां मनुष्य के भूख की कहानी कह रही थी।

लॉकडाउन 4.0 की घोषणा मोदी जी ने की। 18 मई से 31 मई तक दिन का कर्फ्यू हटाने लगे और सिर्फ रेड जोन पर कर्फ्यू और सकती बरकरार थी। बाजार और छोटे रेस्टोरेंट की खुलने की आजादी हो गई थी पर रात का कर्फ्यू चालू था । लोग महानगरों से अपने अपने गांव की तरफ पलायन शुरू कर दिया।यद्यपि घर पहुंचने पर क्वॉरेंटाइन के लिए स्कूल व सामुदायिक केंद्रों को चिन्हित किया गया था। परंतु वहां पर भोजन और भजन की कोई व्यवस्था नहीं की गई।‌ सरकार और सरकारी दूत सिर्फ हुकुम बजा रहे थे ना कि किसी भी तरह से कोई व्यवस्था कर रहे थे। इस दौरान पर जो सबसे खुशी का पल आया है वह मेरे छोटे भाई की बच्ची का जन्म 30 मई को चंडीगढ़ के एक निजी अस्पताल में होना था। अभिभावक के तौर पर मैं सपरिवार दिल्ली से पूरी रात ड्राइव करके चंडीगढ़ पहुंचे थे। हम लोग खुद को खुश और एक्टिव महसूस कर रहे थे और जश्न का माहौल था। अमरावती एनक्लेव बहुत ही सुंदर और एकांकी जगह है जहां पर मैं निश्फिक्र वाकिंग करता था।

कोरोना की महामारी का यदि सही आकलन किया जाए तो सबसे ज्यादा परिवार को छति हुई। भारतीय समाज हमेशा मां को सर्वश्रेष्ठ और सबसे ऊंचा दर्जा दिया, परंतु कोरोना काल में मैंने सबसे ज्यादा बीवियों को संघर्ष करते देखा। मेरे पिताजी ने मेरी शादी होश संभालते ही कर दी थी। मैं रेखा को डाकू मानता था और दो बच्चों के साथ उसने अपना पूरा गिरोह घर में तैयार कर रखी है। जो भी पैसे कमा कर लाता था वह सारे पैसे छीन लेती थी सिर्फ सौ- दो‌ सौ रुपए के चिल्लर मेरे पर्स में छोड़ती थी। प्रश्न करने में बोलती थी कि तुम्हारा खर्चा ही क्या है । जिसे मैं डाकू समझता रहा वही कोरोना के लाकडाउन में मेरे घर के सारे खर्चे उठाएं। मुझ जैसे व्यक्ति को 24 घंटे बर्दाश्त किया। खाना दिया खाना, कपड़े धोए और मेरे हर फरमाइश को पूरा किया। मुझे लगता है कि भारतीय नारी सर्वश्रेष्ठ एक बीवी के तौर पर है। वह सबसे ज्यादा कष्ठ उठाती है। सबसे ज्यादा निस्वार्थ कर्म करती हैं। सबसे ज्यादा अपमान बर्दाश्त करती। और मुसीबत को अपने ऊपर लेती है । यदि परिवार को किसी भी बुरी बला साया हो तो वह नजर उतार देती। कोरोना के लॉकडाउन में सबसे ज्यादा धैर्य की परीक्षा भारतीय नारियों ने दी है।

"जान है तो जहान है" से शुरू हुआ लॉकडाउन 1.0 का सफर समाप्त हुआ 31 मई को और दिनांक 1 जून से अनलॉक डाउन 1.0 का सफर चालू हुआ यह कहते हुए कि "जहान है तो जान है"। हर जगह एक-एक करके दुकाने, व्यापारिक प्रतिष्ठान, फैक्ट्रियां, दफ्तर सब खोल दिए गए गए। अनब्लॉक डाउन का सफर जारी हो गया।

कुछ प्रश्न हमेशा मन में होते, दिल कहता है कि पूछू और दिमाग कहता है कि मत पूछू। सरकार के निर्णय मुझे कभी भी समझ में नहीं आए। मैं खुद से प्रश्न करता हूं की जब देश में कोरना मरीजों की संख्या 500 थी तब पूर्ण लॉकडाउन क्यों घोषित किया गया और जैसे-जैसे मरीजों की संख्या देश में बढ़ती गई, लॉकडाउन में केंद्र सरकार ने क्यों रियायतें बढ़ाती गई। जब देश में मरीजों की संख्या एक लाख नब्बे हजार से ज्यादा हो गई तो अनलॉक डाउन क्यों चालू किया गया।

यदि लाकडाउन से जनता को परेशानी थी, देश की जीडीपी डाउन हो रही थी, इंडस्ट्री बंद हो रही थी, लोग भुखमरी के कगार पर थे, तो क्यों लॉकडाउन किया और यदि "जहान है तो जान है" की बात सच थी तो क्यों आपने 24 मार्च को "जान है तो जहान है" की बात कही।

अनलॉक डाउन और महानगरों से प्रवासी मजदूरों के गांव में पहुंचने से कोरोना की महामारी छोटे कस्बों और गांव तक पहुंच चुकी है जहां पर मेडिकल सुविधाएं नहीं है, डॉक्टर भी नहीं ।लोग संक्रमण से बीमार हो रहे हैं, मर रहे जिसमें मेरा मित्र अनुराग मिश्रा की भी मौत दर्ज है आप क्यों जवाब नहीं देते आप अपनी जिम्मेदारियां जनता के ऊपर क्यों छोड़ देते हैं। अनुराग जैसे लाखों मर चुके हैं या कोरोना से त्रस्त है, परंतु इस देश में कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि यहां की आबादी 135 करोड़ है। यदि लाख व्यक्ति रोज मरे तो भी देश की जनसंख्या को समाप्त होने में 50 वर्ष लगेंगे।

मैं पूछता हूं कि यह आंकड़ा व्हाट्सएप इंवर्सिटी से कौन फैला रहा है। सरकार कि मनसा क्या आम व्यक्ति तक पहुंचाई जा रही है। या सरकार नहीं बेकार है।

सरकार ने निर्णय ले लिया है कोरोना महामारी देश की प्राथमिकता नहीं, बल्कि मंदिर बनाना, इंडस्ट्री को फिर से कायम करना, चाइना के साथ बॉर्डर पर युद्ध लड़ना, युद्ध सामग्री खरीदना, फाइटर प्लेन खरीदना सरकारी प्राथमिकता है। मोदी बोलते हैं की विनाश में विकास की संभावना तलाशे। विपत्ति को अवसर में बदलो, तो भला मैं क्यों चुप रहूं, या मुझ जैसे लोग क्यों चुप रहे।‌हमने भी मौके मे विकास की संभावनाओं को तलाशा और 4 पार्टनर्स के साथ अगस्त एटार्नी एल एल पी का इनकारपोरेशन कराया क्योंकि धंधा है तभी सब कुछ है।

मैं खुद भी नहीं जानता की कब तक मैं जिंदा हूं। कहीं यह कोरोना मुझे भी ना ले डूबे। और सरकार बोले की मैं डायबिटिक था जिससे मेरी मौत हो गई। इसी दौरान पर मेरे महावीर दादा नहीं रहे उनकी यादें बहुत आई, परंतु अनुराग के मृत्यु ने बुरी तरह से तोड़ दीया। नेक इंसान के जाने के बाद लोग दुखी होते और उसके परिवार के मदद के लिए आगे आते हैं। नेक इंसान क्या मैं तो वकील हूं जोकि इस देश में इंसान की श्रेणी में आता ही नहीं। कौन मेरे मरने के बाद मेरे परिवार की, मेरे बच्चों की जिम्मेदारी उठाएगा यह प्रश्न मस्तिष्क में आते ही मैं डर जाता हूं। मैं क्या मुझ जैसे करोड़ों देशवासी के सामने यही यक्ष प्रश्न है। इस बात में अब कोई संदेह नहीं की " जहान है तो जान है"। मैंने अपनी गाड़ी अपने घर "खेल गांव" से निकाल कर ऑफिस, बाबर रोड, कनॉट प्लेस कि तरफ दौड़ा दिया और मेरे साथ मेरा सारथी ड्राइवर है। मैं क्या पूरे रिंग रोड पर जाम लगा हुआ है। हर कोई जान की परवाह किए बिना, कोरोना से डरे बिना, घर में बच्चों के लिए रोटी और रोजगार कि फिराक में निकल पड़ा है। यह सब हालत देखकर कोरोना भी परेशान है, पस्त है और हर आदमी खुद की जिंदगी में अब मस्त है।

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