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टूटते परिवार- जुड़ते लोग

जब पुरुष प्रधान समाज में पुरुषार्थ खो चुके हो पुरुष, व पुरुषों की पारिवारिक व सामाजिक निर्णय लेने की क्षमता न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई हो, तो परिवार,‌ समाज व परंपराएं, पुरुषों के कमजोर वाजू को छोड़ कर, महिलाओं के मातृत्व दामन को थाम लेती हैं। आप घबराइए मत और पछताए मत, क्योंकि पुरुष खुद ही परिवार कि बागडोर ढीली की है जिसने महिलाओं को मौका दिया है और अब आप ज्यादा सुरक्षित है। हमारी नाफरमानी से संक्रमण काल से गुजरता हिंदू समाज और दम तोड़ती परंपराएं, राष्ट्रीय संस्कृति और विरासत को दो राहे पर खड़ी कर दी है।

मुक़दमा दर्ज है समाज की अदालत में जन्हा पर हम सब गुनहगारों कि भांति कटघरे में खड़े हैं। आज अदालत में मुद्दई सुस्त और गवाह चुस्त है। गवाही आज समाजिक मर्यादा कि नाफरमानी का और क्यो न चले मुकदमा ? आज हम मानवीय संवेदना हीन हो गये हैं और सामाजिक मर्यादा तार तार हो रही हैं। समाज कि ठेकेदारी मे हम भूल गए कि परिवार टूट रहे है और टूटते परिवारों से हम समाज जोड़ रहें है। आप का तो पता नहीं, परन्तु टूटते परिवारों से समाज जोड़ने का प्रयोग मुझे अचंभित करता है। सच पूछिए तो मुझे यह प्रयोग डाइजेस्ट ही नहीं होता, क्यों की यह नया सामाजिक ताना बाना परिवार के अस्तित्व को विलुप्त करता और निजी संबंधों के आधार पर लोगों को जोड़ता है जिससे परिवारिक इकाई एकजुट नहीं, बल्कि बिखरी हुई प्रतीत होती है। बिखरे परिवारों के बीच सामाजिक नजारा कमजोर प्रतीत होता है क्यों कि हम जद्दो जहद कर रहें है कि सामाजिक बागडोर खुद के हंथों से न फिसले, जबकि परिवार कि बागडोर हमारी औरतों ने संभाल ली। समाजशास्त्र की मूल अवधारणा है कि परिवारों के समूह से समाज बनता है। जब परिवार कि कमान औरतों ने संभाल रखी है तो समाज कि कमान पुरुष खुद के हांथो में बरकरार रखने की जद्दॊजहद क्यों करते है। पुरुष और औरतों के बीच अस्तित्व और बर्चस्व का संघर्ष स्पष्ट दिखता है जब कोई सामाजिक कार्यक्रम होता है। मैंने यह नजारा हमेशा देखा और महसूस किया और शायद आप भी, कि जब भी कोई सामाजिक फंक्शन्स का आयोजन महिलाओं द्वारा जुड़े परिवार की तरफ से आयोजित होता है तो उस फंक्शन में पूरा परिवार सहृदय बड़ चड़ कर सहभागी बनता है, परन्तु पुरुषों द्वारा जुड़े परिवारों के आयोजित फंक्शन औपचारिकता के भेंट चड़ जाते हैं और प्रेम - उल्लास नदारत होती है।

जीवन का अनुभव मुझे नब्बे के दशक से सतत उत्पन्न होते अन्तर्द्वन्द और अन्तर्द्वन्द के बीच खुद के संघर्ष का है और शायद आप का भी अनुभव कुछ ऐसा ही हो । मैंने कभी ऐसा सोचा न था कि कोरोना काल में रीवा जाकर खुद के परिजनों‌ व बुजुर्गों से मिलने और उनके साथ निजी छड़ों को‌ जीने की लालसा मेरी सासू मां के जीवन के मूल्य में पूरी होगी। मानवीय संवेदनाओं का स्तर इतना गिर गया कि दिल्ली जा कर मै यह भूल गया कि वकालत में लंबे संघर्ष कि ऊर्जा मुझे अपने मां बाप की आकांक्षाओं को पूरा करने और उनके उम्मीदों में खरा उतरने कि इच्छा से मिली थी। मैं जीवन की दौड़ में यह भूल गया था कि बीसवीं दशक के सुरुअती संघर्ष अपने परिजनों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने व अभाव से उन्हें बाहर लाने की थी। बहुत आश्चर्य होता है कि जब संघर्ष कर रहा था तो परिजनों का ध्यान था और आज जब लोगों की नजरों में मै स्टैबलिश लॉयर हूं तो सब कुछ भूल गया और आप भी कोई दूध से धुले नहीं है कभी खुद के गिरवान में झांके ताकि आपका जमीर जगे।

मेरे बचपन के मित्र विवेक ने पिछले वर्ष निजी वार्तालाप में मुझे याद दिलाया था कि हम काम अच्छे जीवन जीने के लिए करते हैं परन्तु काम में इतने मसगुल हो गए हैं कि काम को ही जीवन समझ बैठे हैं और जीवन की खुशियों नदारत हैं। उन्होंने चर्चा को यहीं नहीं विराम दिया बल्कि बेटोक कहा कि जीवन की खुशियां अपनों के बीच और अपनों के साथ है । उनके हर सुख दुख में सहभागी होकर खुद और उनकी उम्मीदों को जगाए रख कर। अपने अनुभव को बताते हुए कई घटनाओं को शेयर किया कि किस तरह से उन्होंने कैरियर के कार्यों साथ सामंजसय बिठाते हुए अच्छे और बुरे पल में अपनों के साथ दिल्ली से रीवा गए और सहभागी बने। सहभागी बनने की राह भी दिखाई जिसे मै पहली बार बड़े गौर से सुन रहा था, परन्तु उनसे मै यह कह नहीं सका की जंहा चाह, वहां राह और तुम्हारे अंदर चाह जिंदा है और मेरे अंदर चाह मर चुकी है। मुझे नहीं पता था कि चाह मेरे अंदर अभी जिंदा थी जो कि सुप्ता अवास्था में थी, जिसके कारण मै बहुत ही गौर से उन्हें सुन रहा था, परिणामत: मै ने भी उनके बताए राह से अपनों के साथ कोशिश सुरु कर दी है और खुद के अंदर खुद को ढूंढ रहा हूं।

टूटते परिवारों का असर समाज में परिलक्षित होता है जिसके पदचिह्न रीवा में मौजूद हैं। रीवा में ब्राह्मण समाज के बीच "अधरजिया तिवारी" का सामज लोकतांत्रिक देश में खुद के सामंतवादी मानसिकता के दंभ से बाहर नहीं निकाल पाया । विंध्यप्रदेश के गठन के साथ ही डी. एम. टी. ( दुबे, मिश्रा, तिवारी) समाज जो की संख्या बल में रीवा राज्य का सबसे बड़ा ब्राह्मण समाज था ने जमीदारो के विरूद्ध लामबंद हुआ जिससे विंध्यप्रदेश समाजवाद का गढ़ बना और उनकी राजनैतिक, आर्थिक स्थिति मजबूत हुई । जमींदारी उन्मूलन ने अधिराजिया तिवारी सामाज की कमर तोड़ दी। राजनैतिक और आर्थिक उत्कर्ष के कारण, दोनो समाज में पहले शादी सम्बन्ध बढ़े जिससे वो सामाजिक सोच के साथ खुद पास खड़े हुए। देश की स्वतंत्रता के बाद सन् 1952 के सुरुआती दौर में राजभान सिंह तिवारी के सांसद बनने के साथ अधाराजिया समाज का जमींदारी कांग्रेस का सफरनामा डी. एम. टी. समाज के तरान हार श्रीनिवास तिवारी के समाजवादी कांग्रेसी सफरनाम के साथ अंत हुआ और रीवा में सत्ता का सामाजिक हस्तांतरण बघेलखंड के ठाकुर समाज के कार्य गुजारियो का परिणाम था जिसका नेतृत्व कुंवर अर्जुन सिंह कर रहे थे और उनसे निपटें के लिए जातिवाद को बढ़ावा मिला। मुझे महसूस होता है कि असल कारण दोनों ब्राह्मण समाज के पतन का कारण टूटते संयुक्त परिवार थे जिससे सामाजिक ताना बाना बिगड़ गया। अंत के बीच राजनैतिक अस्तित्व की लड़ाई निजी व्यक्तिव व खुद के संबंधों के दम पर राजेन्द्र शुक्ला और गिरीश गौतम कर रहें है और इस लड़ाई में समाज नदारत है। मै इस पृष्ठ भूमि की चर्चा विपत्ति काल के दौर पर कर रहा हूं जन्हा हम सभी खुद के अस्तित्व की लड़ाई में लोग जोड़ रहें है और टूटे परिवारों से समाज जोड़ रहे है। रिमहा समाज और राजनैतिक उत्थान पतन की परिचर्चा प्रतीकात्मक स्वरूप से पूरे देश के हर अंचल में समभाव रूप से घटित है सिर्फ सामज, जाति और नेतृत्व के नाम भिन्न है जंहा पर ब्रिटिश हुकूमत, राजतंत्र और लोकतंत्र के हमसफ़र साक्षी हमारी चार पुस्तें हैं।

जीवन में मानवीय संवेदनाओं के जुड़ाव व टकराव में अहम रोल आपसी संवाद करता है। सामाजिक और पारिवारिक द्वंद्व और बर्चस्व की लड़ाई का कारण संवाद हीनता है वरना लोगों के बीच खूंटे को गाड़ने - उखाड़ने का कोई झगड़ा नहीं है। हमारा अहम और उस अहम के शिकार कब हो गए पता ही नहीं चला, नहीं तो हम परिवार को टूटने से रोक सकते थे। परिवार का वर्तमान एकांकी स्वरूप और संयुक्त हिन्दू परिवार दो भिन्न अवधारणाएं और दो भिन्न परिवारिक स्वरूप से निर्मित समाज कि छमताओ, लाभ हानि कि परिचर्चा में भाग लेने दुस्साहस इसलिए जुटा पा रहा हूं क्यों कि कभी मै भी संयुक्त हिन्दू परिवार का सदस्य था और शायद आप भी। मै तो पोते का रोल अदा कर रहा था आप का मुझे पता नहीं। संयुक्त परिवार को टूटते और उस टूटे संयुक्त परिवार से एकांकी परिवार बनने की पीड़ा और जहमत हमने भी उठाई है।

मेरे संस्मरण सन 1980 - 90 के दौरान के है जब होश संभाला तो पाया कि मेरी दादी पुरवा में और बड़ी दादी फरहाद में ठकुराइन थी क्यों की बाबा और बड़े बाबा का स्वर्गवास हो चुका था। दोनों ठकुराइन जमींदारी के अवशेष संभाल रही थी और बड़ा दादा और पापा मजबूती के साथ संयुक्त परिवार की सामाजिक ताकत का लुफ़्त उठा रहे थे और लगभग सभी जगह संयुक्त परिवार थे और समाज की मजबूती संयुक्त परिवार थे। सामाजिक निर्णय के आधार पर शादियां होती थीं और सभी परिवार बड़ी शिद्दत के सरीक होते थे। शादी फंक्शन नहीं बल्कि सामाजिक त्योहार था और मृत्यु समजिक शोक। सामाजिक रिवाज और परंपराएं ही सर्वोच्च थी जिसकी अवज्ञ्या का दुस्साहस कोई नहीं करता था। उस समय संयुक्त परिवार में परदादा , दादा, पोते और परपोते के साथ चार पुस्तें आबाद थी, परन्तु परदादा के यदि दो या अधिक पुत्र थे संयुक्त परिवार के विभाजन की पीड़ा में वो बेहाल थे और वह बेहली अब मै अपने मां बाप के अंदर भी देखता हूं क्यों की उन्हें मेरे और मेरे भाई के बीच विभाजन के आसार नजर आते है। सामाजिक संरचना का साक्षी हूं जन्हा पर दादी, मेरे मां बाप, ताऊ ताई और हम सब एक सुर में साथ खड़े थे, परन्तु घर की बहुओं में खुद के बर्चस्व और निजी हितों का अन्तर्द्वन्द चल रहा था। जब मेरा बालपन था तब अन्तर्द्वन्द बेड रूम तक सीमित थे और समय काल 1980-85 का था, जब किशोर हुआ तो वह द्वंद बेड रूम से घर के आंगन तक आ गया और बहुओं के बीच द्वंद, प्रतिद्वंद में बदल चुका था और समय काल था 1988- 1992 का। जब मै जवान हुआ तो बहुओं का आपसी प्रतिद्वान, घर के आंगन से निकल कर बीच चौराहे पर था और संयुक्त परिवार टूट कर एकांकी परिवार बन चुका था और समय काल था सन् 1993 -96। यह कहानी और पृष्ठभूमि घर - घर की है जिसने संयुक्त परिवार को तोड़ा और हम तो प्रतीकात्मक है। समाज जश्न मना रहा था और समाज ने संयुक्त परिवार के जनो के बीच प्रतिद्वंद को शांति और सुलह की जहमत नहीं उठाई, बल्कि भभकती आग में घी डाला और वहीं परिस्थितियां फिर से निर्मित हैं। मै आज स्वतंत्र रूप से जब आकलन कर रहा हूं, तो पाता हूं कि संयुक्त पारिवारिक समूहों से बना समाज और अन्य समकालीन समाज उसी कार्यकाल में विघटन की ओर अग्रसर हुए और सन् 2005 तक तो पूरा समाजिक तना बना ही चरमरा गया। तीन पुस्तों को समायोजित किया मेरा संयुक्त परिवार, विभाजन के बाद मेरे मां - बाप और हम दो भाई और एक बहन, पता नहीं कब मै और मेरे बच्चों में तब्दील बिना किसी विभाजन के हो गया, मुझे तो पता ही नहीं चला और यही हालत शायद आप के भी हों ?

जीवन में सबसे बड़ी सीख ठोकरों से मिलती है और समय बलवान होता है, मनुष्य तो निमित्त मात्र है। जीवन के संस्मरण उदगृत हो रहें है जब की हम सब कोरोना की वैश्विक महामरी से ग्रस्त हैं और आर्थिक दिवालियेपन की ओर अग्रसर हैं। तारीख गवाह है कि पाषाण काल से मनुष्य का सफरनामा परिवार, समाज और राष्ट्र तक पहुंचने का मूल कारण मनुष्य की सुरक्षा और भरण पोषण की जरूरतें थी। पहले सुरक्षा और भरण पोषण की जहमत परिवार ने उठाई, फिर समाज ने और अब राष्ट्र ने। परन्तु मजबूत व एकीकृत राष्ट्र की कल्पना बेमानी है यदि हम योग्य व जवाबदेह नागरिक पैदा नहीं करते। टूटते परिवारों से स्वास्थ्य नागरिक की कल्पना हाष्यपद् है। जीवन की सारी आकांक्षाओं की आपूर्ति के लिए राष्ट्र पर निर्भरता कंहा तक उचित है। कब तक हम अपनी नाकामियों का ठीकरा सरकार पर फोड़ेगें, जब हम साक्षी है संयुक्त परिवार और समाज की उपयोगिता के। जब हम संयुक्त परिवार का विघटन कर सकते हैं तो क्या फिर से जोड़ नहीं सकते। क्या चरमराती सामाजिक व्यवस्था को पुनः उत्थान की तरफ अग्रसर नहीं कर सकते। इस तरह के यक्ष प्रश्न शिर्फ मेरे मनह स्थित भर मे नहीं, बल्कि आप के अंदर भी उत्पन्न होते हो, परन्तु हम अपनी बातों को अभिव्यक्ति नहीं करते या कहे अनकहे संवादों के बीच वर्तमान परिस्थितियों व सामाजिक विघटन को स्वीकार कर लिए हैं। कब तक यह विघटन का सिलसिला चलेगा पता नहीं।

रीवा की इस बार की यात्रा में जब मै मानपुर में नीलू के घर गया तो चाचाजी जिनकी उम्र 82 वर्ष के करीब है और रिटायर्ड शिक्षक है और चाची की मृत्यु के बाद बुढापे के दौर से गुजर रहें है मैने उनके साथ कुछ पल की निजी वार्ता में पाया कि वो बहुत खुश व संतुष्ट थे। बिना किसी लाग लगाव के उन्होंने उसका क्रेडिट अपनी तीनों बहुओं को दिया और उन्हें बहुत होशियार व सामंजस्य बनाकर रखनेवाला बताया। जैयन्त्री चाचाजी तीन पुत्र व बहुएं व पोतें के साथ एकजुट, आबाद व खुशहाल है जिसका प्रमुख कारण आपसी हास्य संवाद व मानवीय संवेदना है। संवाद व मानवीय संवेदना संयुक्त परिवार को बरकरार रखता है यह बात पुष्ट होती है नीलू के घर से। इसी यात्रा में मुझे अपने साडू साहब हितेंद्र से मुलाकात हुई जो कि मेरे मामाजी के. पी. एस. तिवारी, सतना के बेटे है उनसे निजी चर्चा के दौरान उनके परिवार द्वारा लगातार पिछले 20 वर्षों से हेल्थ व मेडिकल सपोर्ट के बीच फाइट और देश विदेश में नौकरी करते हुए भी सभी बच्चे अपने अपने मां बाप के साथ एक सुर में खड़े, यह परिदृश्य मुझे अचंभित करता है। के. पी. एस. मामाजी चार भाइयों के साथ तीन पुस्तों को समाहित एक जुट हैं। यहां पर मैंने संवाद न के बराबर देखा। लगभग सभी गंभीर स्वभाव के है जबकि राजनीतिक परिवार है। विषम आर्थिक, राजनैतिक व स्वास्थ्य समस्याओं के बाद भी पूरा संयुक्त परिवार अपनी ताकतों व सामर्थ्य के साथ आबाद है जिसका श्रेय हितेंद्र की मम्मी को जाता क्यों की परिवार का नेतृत्व और सारा ताना बाना उनके हांथ में है और मानवीय संवेदना बरकरार है। यदि संयुक्त परिवार को तोड़ने का ठीकरा यदि हम घर की औरतों पर फोड़ते है तो यहां पर तो संयुक्त परिवार घर की औरतों के कारण बरकरार है और घर में पुरुष सारा क्रेडिट भी उन्हें ही दे रहें है। मुझे महसूस होता है कि परिवार के टूटने का कारण विभिन्न परिस्थितियों में सामंजस्य का अभाव या कोई दुरुस्त मैकेनिज्म और फार्मूला अनुपस्थिति है ?

जब मैं खुद अंतर मुखी होकर अपनो से जुड़े अन्य परिवारों को देखता हूं तो मुझे मानवीय संवेदना और संवाद दोनों दिखतें, परन्तु आपसी सामंजस्य का अभाव व बात बात पर आपसी टकराव दिखता है। मुझे लगता जिसका प्रमुख कारण आर्थिक हितों को साधने के लिए कोई प्रायोगिक मैकनिज्म नहीं है। फेयर, ट्रांसपेरेंट मैकेनिज्म के अभाव में परिवार के सदस्यों ने आपसी आर्थिक हितों को साधने में असफल हुए है जिससे परिवार के सदस्यों के बीच लगातार टकराव बड़ा है और संवाद हीनता बड़ी है। मानवीय संवेदनाओं का अभाव हुआ है जिससे संयुक्त परिवार और समाज टूट रहा है। हर परिवार की परिस्थितियां अलग अलग हैं और उनके हितों के साधने के लिए अलग अलग मैकेनिज्म हो सकते हैं। क्या हम खुद मैकेनिज्म डेवलप कर के परिवार को संयुक्त नहीं रख सकते जबकि नई जेनरेशन शिक्षित है और टेक्नॉलाजी, कम्युनिकेशन के साथ यूज्ड टू हो गई है। क्या खुद के आर्थिक हितों की रक्षा करते हुए भी एक जुट होकर संयुक्त परिवार कि तरफ अपने कदम बड़ा नहीं सकते। क्या हम सभी पुनः मजबूत और स्थिर समाज कि स्थापना नहीं कर सकते यह यक्ष प्रश्न मेरे अंदर हमेशा उठता है और शायद आप के भी। हम सब एक नई पहल करने की जहमत क्यों नहीं उठाते, जिससे परिवार का आगे का विघटन न हो, समाज मजबूत बने जिससे राष्ट्र मजबूत हो और रामराज्य कायम हो। हम कितना भी धन, वैभव व उच्च पद से सुशोभित हों, परन्तु शांति और खुशहाली से कोसों दूर है। खुश रहने के लिए हमे अपनो का साथ चाहिए, दुख व विपत्ति में अपनों का सहारा और यह सब संयुक्त परिवार और मजबूत समाज के साथ ही संभव है नहीं तो हम खुद के अस्तित्व की लड़ाई में अकेले होंगे। मुझे पता नहीं क्यों यह सब कह रहा हूं, परन्तु यदि आप गौर करें तो मै कुछ आप से भी कह रहा हूं ?

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